बुधवार, 11 जून 2014

दुलारे भैया (संस्मरण): भाग-२






दुलारे भैया (संस्मरण): भाग-१ पढ़ने के लिए यहाँ जाइये.....।

एक विशेष बात जो उनके बारे में मैं बताना चाहूँगी, वो ये कि उनका सभी धर्मों में विश्वास था। उन्होंने गाड़ी में सभी धर्मों के आराध्यों के चित्र लगा रखे थे और रोज सुबह उठकर उनकी पूजा करते थे। एक ओर जहाँ ये माना जाता है कि मुसलमान जनसंख्या-नियंत्रण में विश्वास नहीं रखते, इस मामले में भी उनकी सोच सबसे आगे थी; उनके सिर्फ़ २ ही बच्चे थे। वे अपने दोनों बच्चों (एक बेटा, एक बेटी) को समान प्यार करते थे, बिना किसी भेदभाव के। अरे हाँ, मैं आपको एक स्वादिष्ट बात तो बताना ही भूल गई। दुलारे भैया को खाने का बहुत शौक था; साथ ही ये जानकारी भी कि किस ढाबे पर कौन सी चीज ज्यादा स्वादिष्ट मिलती है। उनकी इस जानकारी का हम लोग जमकर फ़ायदा उठाते थे।

आज जहाँ बड़े शहरों में लोग अपने पड़ौसी का नाम तक नहीं जानते, वहीं कस्बों और गाँवों में लोग दूसरों की मदद करने के लिए उनके द्वारा मदद माँगने का भी इंतजार नहीं करते। हमारे दुलारे भैया तो इस मामले में भी सबसे आगे थे, मोहल्ले में किसी की भी शादी हो, चाहे उनसे किसी ने कहा भी ना हो, मेरे भाई के साथ खुद भी पहुँच जाते थे मदद करने। वो अपने नाम के अनुरूप ही मोहल्ले के सभी घरों के दुलारे बन चुके थे।

दुलारे भैया की जो बात अब मैं आप लोगों को बताने जा रही हूँ, उसका कर्ज़ तो हम लोग ज़िन्दगी भर नहीं उतार पाएँगे और ना ही शायद कभी भुला पाएँगे। फ़रवरी २००६ की एक शाम मेरे पापा को हार्ट-अटैक पड़ा और इलाज की समुचित सुविधा ना होने के कारण डॉक्टर ने उन्हें १ घण्टे के अन्दर आगरा पहुँचाने को कहा, अन्यथा उनकी जान को खतरा हो सकता था। यह सुनकर हम लोगों के हाथ-पैर फ़ूल गए, क्योंकि आगरा हमारे यहाँ से १३५ किमी. दूर था और अपनी गाड़ी से भी वहाँ पहुँचने में तकरीबन ३ घण्टे तो लग ही जाते थे। पर दुलारे ने हिम्मत नहीं हारी, उसने ड्राइवर के बगल वाली सीट को नीचे करके पापा को उस पर लिटाया। इसके बाद उसने एक हाथ हॉर्न पे रख के १२० किमी. प्रति घण्टा की रफ़्तार से गाड़ी को भगाया और सवा घण्टे में पापा को आगरा पहुँचा दिया, जबकि सड़कों की इतनी खराब हालत को देखते हुए किसी के लिए भी ये नामुमकिन था। वहाँ पहुँचकर डॉक्टर ने भी यही कहा कि अगर आप १० मिनट भी लेट हो जाते तो इनका बचना बहुत मुश्किल था। रात में पापा का ऑपरेशन हुआ। ३ दिनों तक पापा की हालत नाजुक होने की वजह से वे अपने घर तक नहीं गए, जबकि आगरा शहर में ही उनकी ससुराल थी। उस समय उन्होंने वाकई एक बेटे का फ़र्ज़ निभाया और मेरे भाई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे।

अब और क्या कहूँ दुलारे भैया के बारे में; बस ये समझ लीजिए कि वो एक ऐसा अनमोल हीरा हैं, जो कुछ दिनों के लिए गलती से हमारे हाथ लग गया था। मैं तो बस इतना चाहती हूँ कि आप इस संस्मरण को पढ़ने के बाद मुस्लिम एवं अन्य धर्मों के व्यक्तियों के प्रति अपने नज़रिए में बदलाव लाएँ। धर्म तो खुदा की इबादत का एक नज़रिया भर है, इसे किसी भी व्यक्ति या समुदाय के प्रति अपने नफ़रत की वजह ना बनने दें।

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1 टिप्पणी:

  1. इस दूसरे भाग की प्रतीक्षा थी...और ये बात मैं भी बहुत गहराई से मानती हूँ कि इंसान के अच्छा या बुरा होने का उसके धर्म से तो बिलकुल लेना देना नहीं...| जो लोग धर्म के आधार पर ऐसा मानते हैं, उनकी सोच पर मुझे तरस आता है...| बहुत प्यारा संस्मरण...बधाई...|

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